शिव

शिव चालीसा

Shiv Chalisa

लाभ एवं फल

महामृत्युंजय का आशीर्वाद — दीर्घायु और स्वास्थ्यसभी पापों और दोषों का नाशमोक्ष और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्तिवैवाहिक सुख और संतान प्राप्तिशत्रुओं पर विजय और संकटों से मुक्ति

अर्थ

शिव चालीसा भगवान शिव की महिमा का वर्णन करने वाली 40 चौपाइयों का पवित्र स्तोत्र है। इसके पाठ से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

📿

चालीसा पाठ

॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

॥ चालीसा ॥
जय गिरिजापति दीन दयाला।
सदा करत संतन प्रतिपाला॥१॥

भाल चन्द्रमा सोहत नीके।
कानन कुण्डल नागफनी के॥२॥

अंग गौर शिर गंग बहाये।
मुण्डमाल तन क्षार लगाये॥३॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।
छवि को देख नाग मन मोहे॥४॥

मैना मातु की हवे दुलारी।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥५॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥६॥

नंदी गणेश सोहैं तहँ कैसे।
सागर मध्य कमल हैं जैसे॥७॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ।
या छवि को कहि जात न काऊ॥८॥

देवन जबहीं जाय पुकारा।
तबहीं दुख प्रभु आप निवारा॥९॥

किया उपद्रव तारक भारी।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥१०॥

तुरत षडानन आप पठायउ।
लव-निमेष में मारि गिरायउ॥११॥

आप जलंधर असुर संहारा।
सुयश तुम्हार विदित संसारा॥१२॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥१३॥

किया तपहिं भागीरथ भारी।
पुरव प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥१४॥

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं।
सेवक स्तुति करत सदाहीं॥१५॥

वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥१६॥

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला।
जरे सुरासुर भए विहाला॥१७॥

कीन्ह दया तहँ करी सहाई।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥१८॥

पूजन रामचंद्र जब कीन्हा।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥१९॥

सहस कमल में हो रहे धारी।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥२०॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई।
कमल नयन पूजन चहँ सोई॥२१॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥२२॥

जय जय जय अनंत अविनाशी।
करत कृपा सब के घट वासी॥२३॥

दुष्ट सकल नित मोहिं सतावैं।
भ्रमत रहों मोहि चैन न आवैं॥२४॥

त्राहि-त्राहि मैं नाथ पुकारो।
यहि अवसर मोहि आन उबारो॥२५॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।
संकट से मोहि आन उबारो॥२६॥

मातु-पिता भ्राता सब होई।
संकट में पूछत नहिं कोई॥२७॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी।
आय हरो अब संकट भारी॥२८॥

धन निर्धन को देत सदाहीं।
जो कोई जाँचे सो फल पाहीं॥२९॥

अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥३०॥

शंकर हो संकट के नाशन।
विघ्न विनाशन मंगल कारन॥३१॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।
शारद नारद शीश नवावैं॥३२॥

नमो नमो जय नमः शिवाय।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥३३॥

जो यह पाठ करे मन लाई।
ता पर होत है शम्भु सहाई॥३४॥

ॠनिया जो कोई हो अधिकारी।
पाठ करे सो पावन हारी॥३५॥

पुत्र हीन कर इच्छा जोई।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥३६॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे।
ध्यान पूर्वक होम करावे॥३७॥

त्रयोदशी व्रत करे हमेशा।
तन नहिं ताके रहे कलेशा॥३८॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥३९॥

जन्म-जन्म के पाप नसावे।
अंतवास शिवपुर में पावे॥४०॥

॥ दोहा ॥
कहैं अयोध्यादास आस, तुम्हारी।
जानि सकल दुख हरहु हमारी॥

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